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ओबीसी मांग पर याचिका खारिज
अदालत बोली, वर्ग तय करना सरकार का अधिकार क्षेत्र
पसमांदा मुस्लिमों को ओबीसी दर्जा देने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने याचिका ठुकराई
23 Feb 2026, 01:39 PM
Delhi
-
New Delhi
Reporter :
Mahesh Sharma
New Delhi
Supreme Court of India ने पसमांदा मुस्लिम समुदाय को अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) में शामिल करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि किसी समुदाय को पिछड़ा वर्ग घोषित करना न्यायपालिका का काम नहीं है, बल्कि यह निर्णय सरकार और संबंधित आयोगों के अधिकार क्षेत्र में आता है।
याचिका में मांग की गई थी कि पसमांदा मुसलमानों को सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ा मानते हुए उन्हें ओबीसी श्रेणी में शामिल किया जाए, ताकि उन्हें आरक्षण और अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ मिल सके। याचिकाकर्ता के वकील ने सुनवाई के दौरान दलील दी कि पसमांदा समुदाय लंबे समय से सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ा रहा है, इसलिए उन्हें भी अन्य पिछड़ा वर्ग के समान सुविधाएं मिलनी चाहिए।
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि संविधान के तहत किसी भी जाति या समुदाय को पिछड़ा वर्ग घोषित करने की प्रक्रिया तय है और यह जिम्मेदारी कार्यपालिका और संबंधित आयोगों की होती है। अदालत ने यह भी कहा कि न्यायपालिका यह तय नहीं कर सकती कि किसी धर्म या समुदाय के भीतर कौन-सा वर्ग पिछड़ा है और कौन नहीं।
पीठ ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत इस तरह का फैसला नहीं किया जा सकता। अदालत का कहना था कि इस प्रकार की मांग के लिए उचित मंच सरकार या पिछड़ा वर्ग आयोग है, जहां विस्तृत सामाजिक और आर्थिक अध्ययन के आधार पर निर्णय लिया जाता है।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि कुछ राज्यों में मुस्लिम समुदाय के कुछ वर्गों को ओबीसी श्रेणी में शामिल किया गया है, इसलिए पसमांदा मुसलमानों को भी समान लाभ मिलना चाहिए। हालांकि अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया और कहा कि हर राज्य की अपनी अलग प्रक्रिया और मानदंड होते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि पसमांदा मुस्लिमों को ओबीसी दर्जा देने का मुद्दा अब अदालत के बजाय सरकार और आयोगों के स्तर पर ही तय होगा। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में आरक्षण से जुड़े मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा सकता है।
फिलहाल अदालत के फैसले के बाद याचिकाकर्ताओं को सरकार या संबंधित आयोग के समक्ष अपनी मांग रखने का विकल्प खुला हुआ है।
याचिका में मांग की गई थी कि पसमांदा मुसलमानों को सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ा मानते हुए उन्हें ओबीसी श्रेणी में शामिल किया जाए, ताकि उन्हें आरक्षण और अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ मिल सके। याचिकाकर्ता के वकील ने सुनवाई के दौरान दलील दी कि पसमांदा समुदाय लंबे समय से सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ा रहा है, इसलिए उन्हें भी अन्य पिछड़ा वर्ग के समान सुविधाएं मिलनी चाहिए।
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि संविधान के तहत किसी भी जाति या समुदाय को पिछड़ा वर्ग घोषित करने की प्रक्रिया तय है और यह जिम्मेदारी कार्यपालिका और संबंधित आयोगों की होती है। अदालत ने यह भी कहा कि न्यायपालिका यह तय नहीं कर सकती कि किसी धर्म या समुदाय के भीतर कौन-सा वर्ग पिछड़ा है और कौन नहीं।
पीठ ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत इस तरह का फैसला नहीं किया जा सकता। अदालत का कहना था कि इस प्रकार की मांग के लिए उचित मंच सरकार या पिछड़ा वर्ग आयोग है, जहां विस्तृत सामाजिक और आर्थिक अध्ययन के आधार पर निर्णय लिया जाता है।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि कुछ राज्यों में मुस्लिम समुदाय के कुछ वर्गों को ओबीसी श्रेणी में शामिल किया गया है, इसलिए पसमांदा मुसलमानों को भी समान लाभ मिलना चाहिए। हालांकि अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया और कहा कि हर राज्य की अपनी अलग प्रक्रिया और मानदंड होते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि पसमांदा मुस्लिमों को ओबीसी दर्जा देने का मुद्दा अब अदालत के बजाय सरकार और आयोगों के स्तर पर ही तय होगा। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में आरक्षण से जुड़े मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा सकता है।
फिलहाल अदालत के फैसले के बाद याचिकाकर्ताओं को सरकार या संबंधित आयोग के समक्ष अपनी मांग रखने का विकल्प खुला हुआ है।
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