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अकबरनगर याचिकाकर्ताओं को राहत नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने SIR समय सीमा बढ़ाने से किया इनकार
लखनऊ अकबरनगर मामला: अवैध निर्माण पीड़ितों को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिली आज
23 Feb 2026, 04:42 PM
Uttar Pradesh
-
Lucknow
Reporter :
Mahesh Sharma
Lucknow
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अकबरनगर इलाके में अवैध निर्माण हटाने की कार्रवाई से प्रभावित 91 लोगों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। अदालत ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से संबंधित समय सीमा बढ़ाने की मांग पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया।
ये सभी याचिकाकर्ता कुकरैल नदी के किनारे बसे अकबरनगर क्षेत्र के निवासी बताए जा रहे हैं, जहां प्रशासन ने अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई करते हुए कई मकानों को हटाया था। प्रभावित लोगों का कहना था कि घर टूटने के बाद उनके सामने पहचान और निवास से जुड़े दस्तावेज जमा करने में मुश्किलें आ रही हैं, इसलिए मतदाता सूची पुनरीक्षण के लिए अतिरिक्त समय दिया जाए।
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया था कि बूथ लेवल अधिकारियों के पास गणना फॉर्म जमा करने की अंतिम तिथि बढ़ाई जाए ताकि वे भी मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज करा सकें। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और कहा कि इस मामले में उचित मंच हाई कोर्ट हो सकता है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अकबरनगर में हुए निर्माण कुकरैल नदी के बाढ़ क्षेत्र में किए गए थे, जिन्हें पहले ही अवैध घोषित किया जा चुका है। न्यायालय ने माना कि पर्यावरण और नदी क्षेत्र की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अवैध निर्माण हटाने का फैसला उचित था।
प्रशासन की ओर से पहले भी कहा गया था कि कुकरैल नदी के आसपास का इलाका बाढ़ संभावित क्षेत्र है और यहां स्थायी निर्माण की अनुमति नहीं दी जा सकती। इसी आधार पर लखनऊ विकास प्राधिकरण द्वारा इलाके में तोड़फोड़ की कार्रवाई की गई थी।
प्रभावित परिवारों का कहना है कि अचानक की गई कार्रवाई से वे बेघर हो गए और अब दस्तावेजों को व्यवस्थित करने में कठिनाई हो रही है। उनका तर्क था कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने के लिए उन्हें मतदाता सूची में शामिल होने का अवसर मिलना चाहिए।
कानूनी जानकारों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट का रुख यह संकेत देता है कि अदालत अवैध निर्माण से जुड़े मामलों में राहत देने से पहले नियमों और पर्यावरणीय मानकों को प्राथमिकता दे रही है। हालांकि अदालत ने याचिकाकर्ताओं को यह विकल्प दिया है कि वे अपनी मांगों को लेकर हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
अकबरनगर का मामला पिछले कुछ समय से चर्चा में बना हुआ है। एक ओर प्रशासन इसे नदी संरक्षण और शहरी नियोजन से जोड़कर देख रहा है, वहीं दूसरी ओर प्रभावित परिवार पुनर्वास और अधिकारों की मांग कर रहे हैं।
ये सभी याचिकाकर्ता कुकरैल नदी के किनारे बसे अकबरनगर क्षेत्र के निवासी बताए जा रहे हैं, जहां प्रशासन ने अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई करते हुए कई मकानों को हटाया था। प्रभावित लोगों का कहना था कि घर टूटने के बाद उनके सामने पहचान और निवास से जुड़े दस्तावेज जमा करने में मुश्किलें आ रही हैं, इसलिए मतदाता सूची पुनरीक्षण के लिए अतिरिक्त समय दिया जाए।
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया था कि बूथ लेवल अधिकारियों के पास गणना फॉर्म जमा करने की अंतिम तिथि बढ़ाई जाए ताकि वे भी मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज करा सकें। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और कहा कि इस मामले में उचित मंच हाई कोर्ट हो सकता है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अकबरनगर में हुए निर्माण कुकरैल नदी के बाढ़ क्षेत्र में किए गए थे, जिन्हें पहले ही अवैध घोषित किया जा चुका है। न्यायालय ने माना कि पर्यावरण और नदी क्षेत्र की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अवैध निर्माण हटाने का फैसला उचित था।
प्रशासन की ओर से पहले भी कहा गया था कि कुकरैल नदी के आसपास का इलाका बाढ़ संभावित क्षेत्र है और यहां स्थायी निर्माण की अनुमति नहीं दी जा सकती। इसी आधार पर लखनऊ विकास प्राधिकरण द्वारा इलाके में तोड़फोड़ की कार्रवाई की गई थी।
प्रभावित परिवारों का कहना है कि अचानक की गई कार्रवाई से वे बेघर हो गए और अब दस्तावेजों को व्यवस्थित करने में कठिनाई हो रही है। उनका तर्क था कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने के लिए उन्हें मतदाता सूची में शामिल होने का अवसर मिलना चाहिए।
कानूनी जानकारों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट का रुख यह संकेत देता है कि अदालत अवैध निर्माण से जुड़े मामलों में राहत देने से पहले नियमों और पर्यावरणीय मानकों को प्राथमिकता दे रही है। हालांकि अदालत ने याचिकाकर्ताओं को यह विकल्प दिया है कि वे अपनी मांगों को लेकर हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
अकबरनगर का मामला पिछले कुछ समय से चर्चा में बना हुआ है। एक ओर प्रशासन इसे नदी संरक्षण और शहरी नियोजन से जोड़कर देख रहा है, वहीं दूसरी ओर प्रभावित परिवार पुनर्वास और अधिकारों की मांग कर रहे हैं।
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